रसखान का जीवन परिचय | Raskhan ka Jeevan Parichay in hindi

Published by Adarsh Kumar on

raskhan ka jivan parichay

जीवन परिचय –

हिंदी साहित्य और ब्रज भाषा प्रेमी कृष्णभक्त मुस्लिम कवि रसखान का जन्म सन् 1548 ई. में हुआ था । उनका वास्तविक नाम सैयद इब्राहिम था। रसखान कृष्णभक्त थे, इन्होने अपना सारा जीवन गोकुल की गलियों में भजन-कीर्तन में गुजार दिया।

रसखान जी के जन्म वर्ष एवं जन्म स्थान में कई विद्वानों के मतभेद हैं । विद्वानों के मतभेद एवं इतिहास के कुछ साक्ष्य के पश्चात इनका जन्म 1548 ईसवी माना गया , और जन्म स्थान दिल्ली माना गया । रसखान जी ने बताया कि दिल्ली गदर में श्मशान बन चुकी थी । दिल्ली का गदर सन 1613 ईस्वी में हुआ था । जिससे पता चलता है की रसखान जी तब तक काफी उम्र के हो चुके थे । दिल्ली गदर के बाद वे मथुरा चले गए और वहां जाकर श्री कृष्ण की भक्ति करने लगे । और उनकी मृत्यु सन 1628 ईस्वी में ब्रज ( मथुरा ) में हो गई ।

इनके कृष्णभक्ति से प्रभावित होकर गोस्वामी बिट्ठलदास जी ने इन्हें अपना शिष्य बना लिया और बल्लभ संप्रदाय के अंतर्गत पुष्टि मार्ग की दीक्षा प्रदान की। विद्वानों में इनके जीवन काल को लेकर मतभेद है, लेकिन रसखान द्वारा रचित ग्रन्थ ‘प्रेमवाटिका‘  से प्राप्त संतेतानुसार इनका जन्म दिल्ली राजवंश में हुआ था। 

वैष्णव धर्म में दीक्षा लेने के बाद इनका लौकिक प्रेम अलौकिक प्रेम में बदल गया। इनका अधिकांश जीवन ब्रजभूमि पर व्यतीत हुआ, भगवान श्री कृष्ण के प्रति इनका अलौकिक प्रेम इन्हें उनका अनन्य भक्त बनाता हैं। 1614 ई. इनके अंतिम काव्य-कृति ‘प्रेमवाटिका’ का उल्लेख मिलता है और इसी के कुछ वर्ष बाद लगभग 1628 ई. में इनकी मृत्यु वृन्दावन में हुई थी।

  • नाम – रसखानमूल नामसैयद इब्राहिम।
  • जन्म – सन् 1548 ई. – दिल्ली।
  • मृत्यु – सन् 1628 ई.– ब्रज।
  • प्रमुख रचनाएँ – सुजान ‘रसखान’ प्रेमवाटिका।
  • गुरु – गोस्वामी बिट्ठलदास जी।
  • भक्ति – कृष्णभक्ति।
  • भाषा – ब्रज भाषा।

साहित्यिक परिचय –

रसखान ने श्रीकृष्ण की भक्ति में पूर्ण रूप से अनुरक्त होकर अपने काव्य का सृजन किया। काव्य और पिंगलशास्त्र का भी इन्होंने गहन अध्ययन किया। अरबी और फारसी भाषा पर इनकी बहुत अच्छी पकड़ थी।

ये अत्यन्त भावुक प्रवृत्ति के थी संयोग और वियोग दोनों पक्षों की अभिव्यक्ति इनके काव्य में देखने को मिलती है। इन्होंने पूर्णरूपेण समर्पित होकर कृष्ण के बाल रूप एवं यौवन के मोहक रूपों पर अनेक कविताएँ लिखी हैं।

कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम ने ही इन्हें कवि के रूप में पहचान दिलाई। सरसता, सरलता एवं माधुर्य इनके काव्य की विशेषताएँ हैं। इनकी काव्य रचना से ऐसा प्रतीत होता है कि यह संयोग और वियोग दोनों पक्षो के अभिव्यक्ति थे।

काव्य में जितने भी सौन्दर्य, गुण होते हैं, उनका प्रयोग इन्होंने अपनी कविताओं में किया है। काव्य के सभी सौन्दर्य गुणों का प्रयोग कर इन्होने श्री कृष्ण के बाल रूप और यौवन के मोहक रूपों का वर्णन अपनी कवताओं में किया है।

रचनाएँ –

रसखान द्वारा रचित दो रचनाएँ इस प्रकार से है।

सुजान ‘रसखान’ –

139 छंद वाले इस संग्रह में भक्ति और प्रेम विषय पर मुक्त काव्य है। सुजान ‘रसखान’  में कवित्तदोहासोरठा और सवैये हैं।

प्रेमवाटिका –

इस रचना में प्रेम-रस का पूर्ण परिपाक हुआ है। 25 दोहे वाले इस रचना में त्यागमय और निष्काम स्वरुप का काव्यात्मक वर्णन है।

भाषा शैली –

इनकी रचनाओं में सरल व सहज भाषा स्वरुप का प्रयोग हुआ है, इनकी अधिकतम रचनाएँ ब्रज भाषा में हैं। रसखान को रस की खान कहा जाता था, इनकी रचनाओं में दोहा, कवित्त और सवैया पर पूर्ण अधिकार था।

कवि अपनी मधुर, सरस तथा प्रवाहमयी भाषा के लिए प्रसिद्ध है। उन्होंने अलंकारों का अनावश्यक प्रयोग नहीं किया, लेकिन मुहावरों का प्रयोग करने में वे काफी सफल हुए हैं। वह शब्दों के सरल रूपों का ही प्रयोग करते हैं।

मुक्त शैली में रचित इनका काव्य हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। उन्होंने प्राय: दोहा, कवित और सवैया छंदों का सफल प्रयोग किया है। अपने सवैयों के कारण यह उसी प्रकार प्रसिद्ध हैं, जिस प्रकार कबीर अपने दोहों के लिए तथा तुलसी अपनी चौपाइयों के  लिए।

कोमल कांत पदावली में रचित रसखान की कविता कृत्रिमता से काफी दूर है। रसखान के कृष्ण भक्ति प्रेम और श्रेष्ठ काव्य की प्रशंसा करते हुए यह उचित ही कहा गया है- 

“इन मुसलमान हरिजनन पे कोटिक हिंदू वारिए”

साहितियक विशेषताएं –

  1. रसखान की रचनाएँ जो की प्यार के रस से भरपूर होती हैं, श्रृंगार की प्रधानता भी रही हैं। 
  2. इन्होने अपनी लगभग सभी रचनाओं में भाषा को परिमार्जित, सरल और शुद्ध रखा।
  3. रसखान के समय में अधिकतर लेखक केवल पदों की रचना ही करते थे।  पर रसखान ने इस रीत के विरुद्ध जाकर ज़्यादा से ज़्यादा दोहे और कविताएं लिखने पर ज़ोर दिया। 
  4. रसखान की प्यार को हावी कर देने वाली रचनाओं की वजह से उन्हें अमृत की वर्षा करने वाला भी कहा जाता है। 

कृष्ण भक्त कैसे बने? –

ऐसा माना जाता है कि एक बार रसखान पान की दुकान पर खड़े थे तो उन्होंने दुकान पर कृष्ण की लगी तस्वीर देखी तो रसखान के मन में सवाल आया कि की तस्वीर में ये बच्चा कौन है और इसके पैरों में जूतियां क्यों नहीं हैं तो इस बात को रसखान का पागलपन समझते हुए जवाब दिया कि मुझे नहीं पता ये कौन है और इसके पैर में चप्पल क्यों नहीं है।

जब रात को मंदिर पूरी तरह से खाली हो गया तो कृष्ण ने रसखान को दर्शन दिए। तब से रसखान ने कृष्ण भक्त बनने का फैसला ले लिया।  हालांकि ये सिर्फ मान्यता है और इसका कोई प्रमाण ना होने के कारण इसका विश्वास नहीं किया जा सकता।

रसखान की इस जिज्ञासा को देखकर कृष्ण प्रकट हुए और उसे वृन्दावन जाने के लिए कहा। वृन्दावन पहुँच कर वो मंदिर में गए तो पुजारी ने रसखान को मंदिर में प्रवेश करने से मना कर दिया।  इस कारण से वो बाहर ही रुके और कृष्ण की प्रतीक्षा करने लगे।

पद का अर्थ –

कृष्ण भक्ति का निर्णय लेने वाले रसखान उन्होंने कुछ इस तरह व्यक्त की हैं:-

  • मुझे अगर किसी पक्षी का जन्म मिलता है तो मैं यमुना किनारे आदम के पेड़ पर बैठे पक्षी का जन्म लेना पसंद करूंगा। 
  • अगर मुझे किसी पत्थर का जन्म मिलता है तो मैं गावर्धन पर्वत के पत्थर का जन्म लेना चाहता हूँ। 
  • अगर मुझे किसी पशु का रूप मिलता है तो मैं कृष्ण की गाय का रूप लेना चाहता हूँ।
  • अगर मुझे अगला जन्म मिलता है तो मैं गोकुल में ही जन्म लेना चाहता हूँ। 

रसखान के दोहे –

म प्रेम सब कोउ कहत, प्रेम न जानत कोइ।
जो जन जानै प्रेम तो, मरै जगत क्यों रोइ॥

कमल तंतु सो छीन अरु, कठिन खड़ग की धार।
अति सूधो टढ़ौ बहुरि, प्रेमपंथ अनिवार॥

काम क्रोध मद मोह भय, लोभ द्रोह मात्सर्य।
इन सबहीं ते प्रेम है, परे कहत मुनिवर्य॥

बिन गुन जोबन रूप धन, बिन स्वारथ हित जानि।
सुद्ध कामना ते रहित, प्रेम सकल रसखानि॥

अति सूक्ष्म कोमल अतिहि, अति पतरौ अति दूर।
प्रेम कठिन सब ते सदा, नित इकरस भरपूर॥

भले वृथा करि पचि मरौ, ज्ञान गरूर बढ़ाय।
बिना प्रेम फीको सबै, कोटिन कियो उपाय॥

कुछ रचनाएँ –

  • गोरी बाल थोरी वैस, लाल पै गुलाल मूठि।
  • संकर से सुर जाहिं जपैं।
  • मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं।
  • आवत है वन ते मनमोहन।
  • कान्ह भये बस बाँसुरी के।
  • सोहत है चँदवा सिर मोर को।
  • या लकुटी अरु कामरिया।
  • फागुन लाग्यौ सखि जब तें।
  • गावैं गुनी गनिका गन्धर्व।
  • नैन लख्यो जब कुंजन तैं।
  • धूरि भरे अति सोहत स्याम जू।
  • मोरपखा मुरली बनमाल।
  • कानन दै अँगुरी रहिहौं।
  • जा दिनतें निरख्यौ नँद-नंदन।
  • कर कानन कुंडल मोरपखा।
  • सेस गनेस महेस दिनेस।
  • मानुस हौं तो वही।
  • बैन वही उनकौ गुन गाइ।
  • प्रान वही जु रहैं रिझि वापर।
  • मोहन हो-हो, हो-हो होरी।
  • खेलत फाग सुहाग भरी।

उपलब्धियां –

  • विजयेंद्र स्नातक जो कि एक साहित्यकार थे उन्होंने रसखान को “स्वछन्द काव्यधारा के प्रवर्तक” की उपाधि दी थी।
  • हरीश चंद्र ने रसखान जैसे कवियों के लिए कहा है कि इन मुसलमान हरिजनन पै, कोटि हिन्दू वरिये।।
  • रसखान पुराने समय के व्यक्ति थे इसलिए उन्हें कोई उपलब्धि होने का प्रमाण नहीं मिलता मगर उनकी रचनाओं को पढ़ने के बाद कई मशहूर साहित्यकार उनकी तारीफ करते हैं और टिप्पणियां भी करते हैं। 

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