
जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय 450 शब्दो मे – Jaishankar Prasad ka Jivan Parichay
हिन्दी-साहित्य के उद्यान में एक कमनीय कुसुम प्रस्फुटित हुआ। जिसने मुक्त हृदय से अपना पराग विकीर्ण किया। यह अमर कुसुम था- जयशंकर प्रसाद। प्रसाद जी ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा द्वारा हिन्दी-साहित्य को अमूल्य रचनारूपी रत्न प्रदान किया।
जीवन-परिचय – माँ सरस्वती के अमर पुत्र जयशंकर प्रसाद जी का जन्म 30 जनवरी, सन् 1889 ई० को काशी के प्रसिद्ध सुँघनी साहू के प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। आपके पूर्वज मूलत: जौनपुर (उ० प्र०) के निवासी थे। प्रसाद जी के पितामह का नाम शिवरत्न साहू तथा पिता का नाम श्री देवी प्रसाद था। आपके पितामह शिव के परमभक्त तथा दयालु थे।
प्रसाद जी ने अपने माता-पिता के साथ तीर्थस्थानों की यात्राएँ भी की। यात्रा से लौटने के पश्चात् आपके पिता का स्वर्गवास हो गया। चार वर्ष के पश्चात् माता जी भी संसार छोड़कर चल बसीं।
आपका पालन-पोषण तथा शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध आपके बड़े भाई शम्भुरत्न जी ने किया। प्रसाद जी ने घर पर अंग्रेजी, संस्कृत तथा उर्दू, फारसी के साथ-साथ इतिहास, वेद, पुराण आदि का सम्यक् ज्ञान प्राप्त किया। दुर्भाग्यवश 17 वर्ष की आयु में आपके भाई भी इस संसार से चल बसे। प्रसाद जी को पारिवारिक सुख प्राप्त न हो सका। इनको जीवन पर्यन्त विषम परिस्थितियों से संघर्ष करना पड़ा। अन्ततः 15 नवम्बर, सन् 1937 ई० को काशी में आपका निधन हो गया।
कृतियाँ/रचनाएँ – जयशंकर प्रसाद जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने नाटक, काव्य, निबन्ध, उपन्यास आदि सभी विधाओं में हिन्दी-साहित्य को धनी बनाया। उनकी रचनाएँ इस कहानी, प्रकार हैं-
(i) नाटक – चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, अजातशत्रु, राज्यश्री, जनमेजय का नागयज्ञ, ध्रुवस्वामिनी, सज्जन, विशाख, करुणालय आदि।
(ii) उपन्यास – कंकाल, तितली, इरावती (अपूर्ण) आदि।
(iii) कहानी-संग्रह – छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, इन्द्रजाल, आँधी।
(iv) निबन्ध-संग्रह- काव्य कला तथा अन्य निबन्ध
(v) काव्य – कामायनी (महाकाव्य)–आँसू, लहर, चित्राधार, प्रेमपथिक, झरना, कानन कुसुम आदि।
जयशंकर प्रसाद जी ने मात्र 48 वर्ष की अल्पायु में जो अमूल्य साहित्य दिया, वह हिन्दी-साहित्य की अनुपम धरोहर के रूप में हमें मिली।
भाषा-शैली – प्रसाद जी की भाषा शुद्ध परिष्कृत तथा संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली है। प्रसाद जी पहले कवि थे, कहानीकार या निबन्धकार बाद में। आपकी भाषा में मुहावरों तथा लोकोक्तियों का प्रयोग नहीं के बराबर है।
आपकी शैली में भावात्मकता, विचारात्मकता तथा चित्रात्मकता शैली के प्रयोग देखने को मिल जाता है। इसके अतिरिक्त सूक्ति शैली, संवाद शैली तथा अनुसन्धानात्मक शैली का प्रयोग भी जयशंकर प्रसाद जी ने किया है।
प्रस्तुत ‘ममता’ शीर्षक नामक कहानी प्रसाद जी की ऐतिहासिक कहानी है। प्रसाद जी ने ममता के माध्यम से एक बाल-विधवा की करुण कथा को चित्रित किया है। ममता विपरीत परिस्थितियों में भी अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए अपने कर्त्तव्य तथा धर्म के पथ को कभी नहीं छोड़ती।
हिन्दी साहित्य में स्थान – विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर जी का जो स्थान बांग्ला-साहित्य में है वही स्थान हिन्दी साहित्य में प्रसाद जी का है। प्रसाद जी कवि के साथ-साथ कहानीकार, नाटककार तथा उपन्यासकार भी थे। जब तक हिन्दी-साहित्य का अस्तित्व बना रहेगा तब तक प्रसाद जी का धरती पर यशोगान होता रहेगा।